Saturday, March 29, 2008

अश्कों में जैसे घुल गए सब मुस्कराते रंग,
रास्ते में थक कर सो गई मासूम सी उमंग ।
-जावेद अख्तर
शायद ऐसा ही कुच्छ इस ब्लॉग के साथ भी हो रहा है। हर रोज़ दिल का कोई कोना आवाज़ लगाता है की बहार निकालो अपने अन्दर का वो इंसान , पर इंसान ने कभी इस धरती पर भी राज़ नहीं किया है ; तो दिल पे क्या करेगा? राज़ करना केवल शैतान का काम है और वो शैतान कहता है कभी सोने को तो कभी खोने लेकिन ऐसी जगह खोना चाहता है जहाँ पर इंसानी साया भी ना हो । या फिर कोई ऐसी जगह जहाँ केवल उसका राज़ हो । आख़िर एकक्षत्र राज़ किसे अच्छा नहीं लगता.......
फिर कभी अगर आपके अन्दर का इंसान आवाज़ लगाए और आप इस ब्लॉग की तरफ़ मुड़े तो याद रखियेगा आज केवल आपके अन्दर का इंसान जागा है यह जरूरी नहीं है की मेरे अन्दर का इंसान भी जग रहा हो.......
कुच्छ नए की उम्मीद से पहले पिछले को याद करके ही भूल जियेगा
-धन्यवाद
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