Wednesday, April 30, 2008

चलो सुहाना भरम तो टूटा

लाने चले थे क्रांति,
सबको थी यह भ्रांति।
भरोसा कर रहे थे मानव पे,
अपने अन्दर के दानव पे।
तभी भरोसा टूट गया,
जीत का भ्रम छुट गया ।
कोई एक गद्दार था ,
उसके कन्धों पर भी क्रांति लाने का भार था ,
यह भार वह सह ना सका ;
प्यारा बन कर वह रह ना सका।
अब जब सच्चाई सामने आई है,
अश्कों में अग्नि की परछाई है।
चलो अच्छा हुआ
अगली बार जब कदम बढेंगे ,
साथ सिर्फ़ वफादारों को रखेंगे।

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